Master Hindi

Viniyog Parivar Trust Is An NGO Working Under The ‘‘Jain Sangh”
Donation Exempted Under S. 80 (G) Of Income Tax Act. Registered Under Foreign Contribution (Regulation) Act.

सफलता

  • 1991 में मुंबई में 700 लघु कतलखानों के लिए लाइसेंस देने का निर्णय रद्द कराकर मुंबई को कतलखानों की नगरी होने से बचाया जा सका ।
  • संपूर्ण बंगाल राज्य में बकरी इद पर कतल होने वाली लाखों गायों को बचाने के लिए सुप्रीम कोर्ट से नवम्बर 1994 में फैसला प्राप्त किया जा सका और उसके द्वारा अनेक गौवंश के जीव बचे ।
  • 1994 में नागपुर जिले के कामटी गांव में स्थापित होने वाले कतलखाने को रोका जा सका ।
  • मुंबई और नवी मुंबई में हर वर्ष होने वाले हजारों कुत्तों की निर्मम कतल को कानूनी कार्रवाई से जनवरी, 1994 से रोका जा सका । फिर जनवरी, 1997 में जब कतल चालू होने वाली थी, उसे भी मुंबई हाईकोर्ट में केस कराकर रोका जा सका । इस केस की अपील सुप्रीम कोर्ट द्वारा खारिज कर दी जाने से यह रोक स्थायी स्वरुप की बन गयी है और इस विषय में दिशानिर्देश तैयार हो गये हैं जिसकी देशव्यापी असर होती जा रही है ।
  • मुंबई हाईकोर्ट की पूर्ण खंडपीठ द्वारा दिसम्बर 2008 में दिए गए आदेश में नगरपालिका के कुत्तों को मारने के अधिकार को अबाधित ठहराए जाने पर उसके विरुद्ध सुप्रीम कोर्ट में हमने अपील की है, जो पेंडिंग है । हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ स्टे दिया गया है ।
  • मुंबई उच्च न्यायालय के 1998 में दिए गए आवारा कुत्तों की नसबंदी की योजना संबंधी आदेश का पालन न करने के लिए मुंबई महानगर पालिका के विरुद्ध विनियोग परिवार ने अदालत के अनादर की याचिका की ।
  • सुप्रीम कोर्ट के एक केस द्वारा मार्च 1994 में ईदगाह - दिल्ली के कतलखाने में होनेवाली दैनिक 12,500 पशुओं की कतल को घटाकर 2500 पशुओं तक की जा सकी और उसके द्वारा अभी तक लगभग 5.50 करोड़ जीवों को बचाया जा सका।
  • मुंबई के देवनार कतलखाने के विरुद्ध कानूनी लड़ाई चालू है । एक केस में माननीय मुंबई हाईकोर्ट द्वारा एक उच्च स्तरीय समिति का गठन किया गया है, जो महाराष्ट्र में पशु-रक्षा संबंधी कानूनों के पालन पर नजर रखेगी । इस समिति में श्री केसरीचंद मेहता को सदस्य के रुप में और विनियोग परिवार के ट्रस्टी तथा कानूनी सलाहकार श्री राजेन्द्र जोशी को संयोजक के रुप में शामिल किया गया है ।
  • अल-कबीर कतलखाने के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में किए गए केस में एक अंतरिम आदेश के अनुसार 1 अप्रैल, 1997 से 50% कतल कम करा दी गई थी । यह प्रतिबंध 20 नवम्बर, 1997 को केस की फिर सुनवाई होने तक चालू रहा । अर्थात् प्रतिदिन 250 भैंसों और 2500 भेड़-बकरियों की कतल बंद हुई और इस प्रकार आठ महीने में लगभग 5 लाख जीव बचे । हालांकि 20 नवम्बर, 1997 से यह प्रतिबंध एक अंतरिम आदेश द्वारा फिर उठा लिया गया । इन अपीलों की अंतिम सुनवाई 23-9-2004 को मात्र 2-3 घंटे का समय देकर पूरी कर दी गई और निर्णय सुरक्षित रखा गया । किसी अज्ञात कारण से सुनवाई पूरी हुई घोषित की जाने के 18 महीने बाद 29-3-2006 को इन अपीलों पर फैसला सुनाया गया । कोर्ट ने मांस निर्यात नीति की समीक्षा करने का केन्द्र सरकार को आदेश दिया ।
  • राजस्थान के निम्बाहेडा गांव में प्रतिदिन 300 पाड़े मारने की क्षमतावाले चालू हो चुके कतलखाने का गांव के स्थानीय लोगों तथा नगरपालिका के अध्यक्ष तथा श्री श्याम अग्रवाल के द्वारा प्रचंड विरोध किया गया और कानून की एक धारा द्वारा बंद कराया गया।
  • 10 वी पंचवर्षीय योजना के लिए मांस क्षेत्र के बारे में की गई भयंकर और घातक सिफारिशों के खिलाफ विनियोग परिवार द्वारा एक वर्ष मुहिम चलायी गई और उसके अंत में सफलता मिली ।
  • योजना आयोग, भारत सरकार के अंतर्गत कृषि मंत्रालय के पशुपालन विभाग द्वारा गठित की गई मांस निर्यात की उपसमिति क्रमांक X1 द्वारा 10 वीं पंचवर्षीय योजना की सिफारिशों में बड़े पैमाने पर विशाल और छोटे कतलखाने गांव-गांव में खोलने की सिफारिश थी । उसके विरोध में ``विनियोग परिवार'' और उसकी सहयोगी संस्था ``अखिल भारत कृषि गोसेवा संघ'' द्वारा प्रधानमंत्री, योजना आयोग के उपाध्यक्ष आदि को विरोध पत्र भेजे गए और देशव्यापी मुहिम चलायी गई । श्री के. सी. पंत से व्यक्तिगत भेंट की गई । लगातार एक वर्ष तक चलायी गई मुहिम के अंत में अखिल भारत कृषि गोसेवा संघ के कार्याध्यक्ष श्री उदयलालजी जारोली को योजना आयोग द्वारा 13-6-2002 को लिखित पत्र द्वारा सूचित किया गया कि मांस संबंधी किसी भी नई योजना को स्वीकृति नहीं दी जाएगी । इस तरह गांव-गांव कतलखाना स्थापित करने की योजना रोकी गई । 4347 नए कतलखाने स्थापित करने की योजना थी ।
  • गुजरात राज्य द्वारा 1992 में संपूर्ण गोवध बंदी का कानून (सुधार) बनाया गया था जिसे गुजरात हाईकोर्ट में कसाइयों द्वारा चुनौती दी गई । 1958 के सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले को आधार बनाकर गुजरात हाईकोर्ट ने यह कानून सुधार रद्द किया । उसके खिलाफ हमने और गुजरात सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की, जिसकी सुनवाई 7 जजों की संविधान खंडपीठ के समक्ष अगस्त 2005 में हुई और और इस केस में सुप्रीम कोर्ट ने अक्टूबर 2005 में 1958 के फैसले को रद्द बताकर गुजरात राज्य का संपूर्ण गोवंश हत्या बंदी का कानून मंजूर रखा । इस तरह 47 वर्ष से चली आ रही एक प्रबल बाधा दूर की जा सकी ।
  • मध्य प्रदेश में वहां की तत्कालीन मुख्यमंत्री सुश्री उमा भारतीजी के कार्यकाल में संपूर्ण गोवंश की हत्या पर प्रतिबंध लगानेवाला ``दी मध्यप्रदेश गोवंश वध प्रतिबंध अध्यादेश 2004'' के नाम से एक अध्यादेश 22 जनवरी, 2004 को घोषित किया गया । इस अध्यादेश को तीन कसाइयों द्वारा सुप्रीम कोर्ट में 27 फरवरी, 2004 को चुनौती दी गई । यह रिट याचिका नं. 123/2004 लम्बित थी, उसी बीच मध्यप्रदेश राज्य सरकार ने अध्यादेश को कानून में बदल दिया और ``दी मध्यप्रदेश गोवंश वध प्रतिबंध अधिनियम, 2004'' कानून पारित किया । मध्यप्रदेश के मामले में भी विनियोग परिवार फिर एक बार अपनी सहयोगी संस्था अखिल भारत कृषि गोसेवा संघ के नाम से इंटरविनर के रुप में दाखिल हुआ । यह केस 4-3-07 को सुनवाई के लिए लिया गया । राज्य सरकार तथा अखिल भारत कृषि गोसेवा संघ के वकीलों द्वारा गुजरात के केस में सात जजों की संविधान खंडपीठ द्वारा इसी मुद्दे पर दिए गए फैसले को आधार बनाकर दलीलें दी गई और यह फैसला इस मामले में भी बंधनकारी बताया गया । माननीय कोर्ट ने कसाइयों की रिट याचिका खारिज कर दी और मध्य प्रदेश के कानून को बहाली दी । इस तरह अब मध्य प्रदेश राज्य में (और उसके साथ छत्तीसगढ़ राज्य में भी) संपूर्ण गोवंश हत्याबंदी लागू हो गई है । गुजरात के कानून को अक्टूबर, 2005 में बहाली मिली थी । तदुपरांत राजस्थान, पंजाब, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, उत्तरांचल, झारखंड राज्यों में संपूर्ण गोवंश वध बंदी का कानून है ही । महाराष्ट्र में 1995 में पारित किए गए कानून को राष्ट्रपति की मंजूरी मिलने के प्रयत्न विनियोग परिवार द्वारा शुरु किये गये हैं और यह मुद्दा ठीक ठीक आगे बढ़ा है ।
  • पक्षियों पर होने वाले अमानवीय अत्याचारों और उनकी गैरकानूनी बिक्री को रोकने की दिशा में मुंबई हाईकोर्ट से एक अभूतपूर्व फैसला अक्टूबर, 1997 में प्राप्त किया गया और उसके लिए समिति गठित की गई है ।
  • गुजरात सरकार का मत्स्योद्योग मंत्रालय कच्छ के 14 जलाशयो में मछली मारने के लिए 3 वर्ष की निविदा देने वाला था । वह योजना सितम्बर 1997 में प्रचंड विरोध द्वारा बंद रखवाने में सफलता मिली ।
  • अनेक राज्यों में गोवंश वध बंदी को कानून बनवाया जा सका । मध्य प्रदेश, राजस्थान और गुजरात में गोसेवा आयोग स्थापित करने का कानून बनवाकर आयोग की स्थापना भी करायी गई । उसके द्वारा अनेक जीवों को बचाया जा सका।
  • पशुओं के प्राण समान गोचर जमीन बचाने का प्रयत्न : ``गोपालक संघ सोलापुर'' पांजरापोल ने 26 एकड़ जमीन गोचर के रुप में उपयोग के लिए 1936 से सरकार से लीज पर ली थी । 1984 में महाराष्ट्र सरकार ने नोटिस देकर इस जमीन को कब्जे में लेने का प्रयास किया । संस्था द्वारा कोर्ट में याचिका दायर की गई । कोर्ट ने अंतरिम आदेश द्वारा संस्था का कब्जा चालू रखा, परन्तु अगस्त, 1993 में केस पर अंतिम निर्णय देते हुए कोर्ट ने संस्था की याचिका खारिज कर दी तथा जिला कोर्ट और मुंबई हाईकोर्ट में भी अपील खारिज हो गई । फिर पू. आचार्य भगवंत श्री कलापूर्ण सूरिश्वरजी म.सा. की आज्ञा से विनियोग परिवार द्वारा इस केस की आगे की कार्रवाई शुरु की गई और सुप्रीम कोर्ट में SLP दायर की गई और मुंबई हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ स्टे भी प्राप्त किया गया ।
  • कानून की खामियां दूर करने के लिए विनियोग परिवार द्वारा रिट : 1 से 3 वर्ष के बीच के गौवंश के नर पशुओं की अंधाधुंध हत्या को रोकने के लिए तथा कतल पूर्व `फिट फॉर स्लॉटर' का प्रमाणपत्र प्राप्त करने में होते भयंकर भ्रष्टाचार, इन दोनों मुद्दों पर विनियोग परिवार ने माननीय मुंबई हाईकोर्ट में एक रिट याचिका 27 अप्रैल, 1998 को दायर की और इस संबंध में वैकल्पिक व्यवस्था के सुझाव भी भेजे गए । अंतरिम राहत के रुप में राज्य में 16 वर्ष तक के गोवंश नर पशुओं (बैल/सांढ़) की हत्या नहीं की जा सकती, ऐसा फैसला माननीय हाईकोर्ट द्वारा दिया गया । हालांकि तुरंत ही उसके खिलाफ कसाइयों ने स्टे प्राप्त किया । उसके विरुद्ध सुप्रीम कोर्ट में अपील की जाने पर, सुप्रीम कोर्ट ने इस केस में अंतिम निर्णय देने का हाईकोर्ट को निर्देश दिया । हाईकोर्ट में राज्य सरकार ने कहा कि राज्य के 1995 में पारित किए गए संपूर्ण गोवंश वधबंदी के कानून पर पुनर्विचार करने के लिए जून 2008 में एक समिति का गठन किया गया है । हालांकि इस समिति ने अभी तक (मार्च 2010 तक) अपनी रिपोर्ट सरकार को सुपुर्द नहीं की है ।
  • विनियोग परिवार द्वारा देवनार कतलखाने का विरोध, उसके आधुनिकीकरण का विरोध, उसमें हो रही निर्यात के लिए कतल का विरोध तो चालू ही है । उसके अलावा परन्तु जीवदया प्रेमी करदाताओं के पैसों में से कतल का खर्च सब्सिडाईस न हो, उस मुद्दे पर पालिका में सार्वजनिक हित की रिट याचिका भी दायर की गई थी । पालिका द्वारा कतल की फीस बढ़ाने के प्रस्ताव और एफिडेविट को मान्य रखकर माननीय हाईकोर्ट ने विनियोग परिवार के उपरोक्त केस को `डिस्पोस-ऑफ', किया था, जिसके कारण मुंबई के जीवदया प्रेमियों के 2.75 करोड़ रुपये देवनार कतलखाने में प्रयुक्त होने से बचे थे । परन्तु कतल की बढ़ी दरों के खिलाफ मुख्यमंत्री ने चुनाव के पूर्व स्टे दिया था । वह स्टे हटाने के लिए हाईकोर्ट में फिर से केस किया गया है ।
  • परमपूज्य गणिवर्य श्री भुवनरत्न विजयजी म.सा. और विनियोग परिवार के निरंतर प्रयत्नो से महाराष्ट्र के पाचोरा, लातुर, उस्मानाबाद, वरेड़ा, चांदवड़, नासिक, जलगांव, येवला, मड़गांव, मनमाड़ और बारामती में पर्युषण के आठों दिन कतलखाना तथा मांस-मछली व्यापार बंद रखने का निर्णय नगरपरिषदों ने घोषित किया था और लगभग 10,000 पशुओं को अभयदान देने में पूज्यश्री निमित्त बने थे ।
  • परमपूज्य गणिवर्य श्री भुवनरत्न विजयजी म.सा. और विनियोग परिवार के प्रयत्नों से महाराष्ट्र में प्रदूषण नियंत्रण संबंधी कानूनों का पालन न करने से लगभग 70 कतलखानों को बंद करने का आदेश 3 पिटिशनों में नवम्बर - दिसम्बर, 2009 में हाईकोर्ट में प्राप्त किया गया ।

**********