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बैल : प्रजा का पालनहार

धर्म के आश्रय के बिना सुख व शांति नहीं मिलते । धर्म बैल का रुप धरकर जीवसृष्टि के सुख और शांति के लिये निरंतर परिश्रम करता है, एसा वेद मानते हैं । वेदों ने बैल को धर्म का अवतार माना है और गाय को विश्व की माता माना है। फिर भी बैल का मूल्यांकन गाय की अपेक्षा दस गुना माना है । एक तंदुरुस्त तथा युवा बैल का दान करने से दस गाय के दान का पुण्य मिलता है, एसा वैदिक शास्र कहते हैं।

सरकारी क्षेत्र या निजी क्षेत्र या सार्वजनिक क्षेत्र में अफसर, नौकर या मजदूर जो काम करते हैं, उसके बदले उन्हे वेतन मिलता है। नियमानुसार वेतनवृद्धि मिलती है । उनका कर्तव्य क्षेत्र व उनके कामकाज का समय भी तय होता है। नियत समय से अधिक समय तक काम करना हो तो उनको अतिरिक्त वेतन - ओवरटाईम के रुप में - मिलता है । उनको भविष्य निधी व ग्रेच्यूईटी मिलते हैं। उनका बीमा भी कराया जाता है । उनको निशुल्क स्वास्थ्य सेवा भी उपलब्ध होती है । महंगाई भत्ते इत्यादि भत्ते मिलते हैं । नौकरी करते समय यदि कोई दुर्घटना हो - चोट लगे, तो मुफ्त सुश्रुषा तथा मुआवजा भी मिलता है ।

उनको सप्ताह में एक दिन की छुट्टी मिलती है । प्रति वर्ष नियत त्यौहारों का अवकाश मिलता है । नियत दिनों की बीमारी की छुट्टी और वेतन सहित अन्य अवकाश भी मिलता है । और इन सब के अलावा बोनस भी मिलता है । और यदि उनकी वेतन बढ़ाने की, मंहगाई भत्ते बढ़ाने की या अधिक बोनस की मांग न स्वीकारी जाये तो वे हड़ताल भी करते हैं । कई बार ये हड़तालें हिंसक दंगो में परिवर्तित हो जाती हैं। लाखों करोड़ों की राष्ट्रीय संपत्ति का नाश होता है। सैंकड़ों लोग घायल होते हैं, कभी कभी अनेक लोगों की मृत्यु भी होती है।

हमारे देश के 6 करोड़ 32 लाख (सन् 1992 के आंकडों के अनुसार) बैल खेतों में, रास्तों पर, तेल पीलने के कोल्हूओं में, आटा पीसने की चक्कीयों में, कुओं पर लगे रेंहट में रात-दिन काम करते हैं । चिलचिलाती धूप में, बर्फानी शीत में, मूसलधार वर्षा में या रात्रि के गाढ़ अंधकार में ये बैल मानव जाति के सुख, आराम व शांति के लिये काम करते हैं । उनके काम करने का समय मर्यादित नहीं है। उनको कोई ओवर टाईम नहीं मिलता । उनके लिये कोई भविष्य निधी या ग्रेच्यूईटी नहीं है । वे ज्यादा खाना नहीं मांगते । कम खाना दो तो विरोध नहीं करते। रोज के मात्र 7 किलो घास व 3 किलो खली से संतोष कर लेते हैं । वे अपने स्वयं के पोषण के लिये मर्यादित भोजन और पीने के पानी के अलावा कुछ नहीं मांगते । हक की छुट्टी, महंगाई भत्ता, बोनस इत्यादि नहीं मांगते । ज्यादा समय काम करवाने का विरोध नहीं करते । कभी हड़ताल पर नहीं जाते ।

इतने कम वेतन में भी वे सैंकड़ों अबज रुपये की कीमत की कृषि उपज पैदा करके देते हैं । करीब ढ़ाई अबज टन माल की ढुलाई करते हैं । यह ढुलाई देश का हजारों करोड़ रुपये का डीज़ल बचाती हैं, विदेशी मुद्रा बचाती हैं । बैल लाखों टन गन्ना पीलते हैं । लाखों टन तेलबीज पीलते हैं, जमीन जोतते हैं, अनाज की बुआई करवाते हैं, अनाज के डूंडों से अनाज के दाने निकलवाते हैं। कूओं या बावडियों पर रेंहट खींच कर खेतों में पानी भी पहुँचाते हैं ।

आधी रात को अचानक ओले पड़ें और एसे में फसल को बचाने के लिये तुरंत सिंचाई की जरुरत पड़े और उसी समय पंप बिगड जाये जा बिजली की आपूर्ति न हो तो क्या हो ? फसल के नाश के अलावा और क्या परिणाम आये ? परंतु बैल एसी आपत्कालीन परिस्थिति में भी नाराज नहीं होता । दिन भर की कडी महेनत करके, थकान से लोथपोथ होकर सो गया हो तो भी आधी रात को गहरी नींद से वह एक ही आवाज में उठ खड़ा होता है और बिना किसी विरोध के बर्फानी ठंड में रेंहट में जुत कर सिंचाई की शुरुआत करता है और उपज को बचाने का पुरुषार्थ करता है।

इस अतिरिक्त सेवा का कोई मेहनताना नहीं मांगता है । दूसरे दिन अवकाश भी नहीं रखता है और वर्ष के अंत में बोनस भी नहीं मांगता है । वह तो बोनस मांगने के बदले स्वत हमें उसके गोबर व मूत्र के रुप में बोनस देता है । उस बोनस से हम जो करोडों की समृद्धि पाते हैं, उसकी वह ईर्ष्या भी नहीं करता है।

बैल, सांढ और बछडों को हम जो खिलाते हैं उसकी एवज में वह हमारे लिये परिश्रम करते हैं, हमारा बहुमूल्य काम कर देते हैं । गाय और भैंस को हम जितना खिलाते हैं उसके अनुपात में वे हमें दूध और बछड़े-बछड़ी तथा पाड़े-पाड़ी देते हैं । इस तरह गाय, भेंस, बैल या पाड़े के साथ हमारा हिसाब चुकता हो जाता है।

फिर भी अतिरिक्त तया वे हमें उनके गोबर व मूत्र रुपी बोनस देते हैं । उस बोनस से हमारे धर्म, संस्कृति, समृद्धि, स्वास्थ्य और सामाजिक संगठन की रक्षा होती है। महाभारतकार ने गाय का मूल्यांकन उसके दूध के आधार पर नहीं, परंतु गोबर के आधार पर किया है । गोबर में लक्ष्मी का वास है । धन गोबर से मिलता है, दूध से नहीं ।

परंतु पश्चिमी विचारधारा ने हमें गलत राह पर च़ढ़ा दिया है । गोबर को भुलाकर हमारे सामने दूध को रख दिया है । हमारी संस्कृति ने गाय और दूध दोनों को ही कभी व्यापार की चीज की तरह मान्यता नहीं दी है। दोनों के व्यापार को पाप माना है। किंतु पश्चिमी शिक्षा के प्रभाव में हम गाय को `डेयरी एनिमल' की तरह देखने लगे हैं और परिणाम स्वरूप गाय कतल की चीज बन गयी है।

वेद धर्म में मात्र गाय को ही `अघन्या' अर्थात् ` न मारने योग्य' कहा है एसा नहीं है । `गो' अर्थात् मात्र गाय नहीं, परंतु समस्त गोवंश । अत वेद धर्म ने समस्त गोवंश को `अघन्या' कहा है।

वेदों ने बैल को गाय से अधिक मूल्यवान माना है, इसलिये उससे काम कराते समय उसे अनुचित कष्ट न हो इस तरह से काम करवाने के नियम भी बनाये हैं । हल में जोतने के लिये दो नहीं आठ बैल होने चाहिये, तो ही उनसे आठ घंटे काम लिया जा सकता है, अर्थात् प्रत्येक दो घंटों में बैल की जोड़ी बदलनी चाहिये । एक जोड़ी अर्थात् दो बैल सतत दो घंटों से अधिक काम करें यह वेद धर्म को मान्य नहीं है। बैल को बैलगाड़ी में जोतने के या पानी की रेंहट में जोडने के नियम भी धर्मशास्र ने बनाये हैं । बैलों को किसी तरह का कष्ट न हो इसके लिये वेद धर्म सजाग हैं ।

भगवान शंकर ने बैल को अपना वाहन बनाकर उसे स्वयं का संरक्षण दिया है। अपने ध्वज में उसे स्थान देकर स्वयं को वृषभध्वज कहलाया है। भगवान शंकर का स्थान कैलास पर्वत पर है । अर्थात् विश्व के सबसे ऊँचे स्थान पर अपना आसन बनाकर, वहाँ अपना ध्वज गाड़ कर वृषभ को विश्व के सबसे ऊँचे आसन पर प्रस्थापित किया है । भगवान शंकर की पूजा करने से पहले नंदी की पूजा करनी होती है । इस तरह भगवान शंकर ने बैल को ऊँचा स्थान देकर उसकी महत्ता स्थापित की है।

जिस तरह वेदों ने गाय का मूल्यांकन उसके दूध से नहीं, अपितु उसके गोबर से किया है; उसी तरह बैल का मूल्यांकन भी उसकी श्रम शक्ति से नहीं, अपित्तु `गोबर में लक्ष्मी का वास है', एसा कहकर गोबर से किया है । परंतु दुर्भाग्य से पश्चिमी शिक्षा के प्रभाव से हमने बैल का मूल्यांकन उसकी श्रम-शक्ति से करके उसका अवमूल्यन कर दिया है ।

हमारी चार पुरुषार्थ - धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष-की संस्कृति की प्राणशक्ति गोबर है। यह भुलाकर दूध देने व श्रम करने की शक्ति का गलत मापदंड अपना कर हमने हमारे पशुधन का अवमूल्यन कर दिया है। परिणाम स्वरुप हमारा पशुधन आर्थिक मूल्यांकन की कसौटी पर अनार्थिक करार दिया जाकर कतल-पात्र बन रहा है।

पशुधन की कत्ल होने से गोबर की आपूर्ति टूट चूकी है, जिससे गोबर का अकाल पड़ गया है और गोबर का अकाल अर्थात् लक्ष्मी का विसर्जन । लक्ष्मी का विसर्जन होने से प्रजा बेकारी, गरीबी, बिमारी तथा भुखमरी से पीडित है ।

अब पशु मात्र कतल से ही नहीं मरते, भुखमरी से भी मरते है, प्यास से भी मरते हैं । भूख और प्यास से उनको मरते हुए न देख पाने वाले पशुपालक उनको बेच देते हैं और अंतत वे कसाई के हाथ में पहुँचते हैं ।

बैलों की भीषण कत्ल से सांढों का तो निकंदन ही निकल गया है । हमारे देश को 1 करोड़ 57 लाख तंदुरस्त सांढों की आवश्यकता है, जबकि मात्र 60-70 लाख निर्बल और अकर्मण्य सांढ आज देश में हैं। परिणाम स्वरुप देश की कुल 6 करोड 26 लाख प्रजनन योग्य गायों को योग्य समय पर सांढ न मिलने से 2 करोड 62 लाख गायें बांझ बन गयी हैं । अर्थात् ये 2 करोड 62 लाख गायें निर्वंश जायेंगी । कतल किये बिना ही इन गायों के द्वारा पैदा होने वाले 18 करोड़ गोवंश (प्रति गाय 8 गोवंश के हिसाब से) का जन्म अटक कर हमारे गोवंश का - पशुधन का निकंदन निकल जायेगा ।

गोवंश मात्र कानून से नहीं बचेगा । गोवंश बचाना हो तो,
(1) गोबर की महत्ता का स्वीकार करना होगा ।
(2) गोचरों को विस्तरित करना होगा ।
(3) बिनौले (कपास के बीज) का तेल निकालना बंद करना होगा ।
(4) खादी-ग्रामोद्योगों को फिर सजीवन करना होगा ।
(5) वर्तमान कृषि नीति में आमूलचूल परिवर्तन करके पारंपरिक कृषि पद्धति पुन अपनानी होगी ।

- स्व. श्री वेणीशंकर मुरारजी वासु