Viniyog Parivar Trust Is An NGO Working Under The ‘Jain Sangh”
Donation Exempted Under S. 80 (G) Of Income Tax Act. Registered Under Foreign Contribution (Regulation) Act.

जीवदया

  • 13 जून 1997 को राजस्थान के कोरोली गांव से 5000 बैलों को कतलखाना में ले जाने से रोककर उनका खेती के कार्य के लिए दान स्वरुप में निशुल्क वितरण कर दिया गया । इस तरह कीमत की दृष्टि से 50 लाख रुपए के बैलों का जीवन बचाया गया और विनियोग परिवार की ओर से 25 हजार रुपए घासचारे के खर्च के लिए भेजे गए ।
  • 21-11-1997 को 999 बछड़े राजस्थान से पैदल औरंगाबाद में कतल के लिए ले जाए जा रहे थे जिसकी जानकारी अखिल भारत कृषि गो सेवा संघ के कार्यकर्ताओं को मिली । उनको कब्जे में लेकर गोपाल अग्रवाल शेठ की गोशाला में रखा गया ।
  • इसी तरह से 923 बछड़ों को कतल होने से बचा लिया गया । 24-9-1998 को राजस्थान के बारां जिले से मध्य प्रदेश के होशंगाबाद में कतल के लिए पैदल चलाकर लाए गए 923 बछड़ों को श्री केसरीचंद मेहता ने बचाकर मध्य प्रदेश गोसेवा आयोग को देखरेख के लिए सोंपा।
  • 7-12-99 तथा 10-12-99 को राजस्थान के मेडता सिटी रेलवे स्टेशन पर 3100 बछड़ों से भरी दो गाड़ीयाँ तथा 20-12-99 को फलोदी गांव में और 1400 बछड़ों से भरी गाड़ी श्री केसरीचंद जी मेहता तथा कार्यकर्ताओं ने पकड़ी और मालवा प्रांत की गोशालाओं को सुपुर्द की ।
  • 1989 में राजस्थान से मुंबई आने वाली मालगाड़ी में 711 बैल देवनार कतलखाना में ले जाए जा रहे थे । वसई स्टेशन पर श्री केशरीचंदजी मेहता तथा वर्धमान संस्कृति धाम और बजरंगदल के युवाओं ने हिंमत दिखाकर गाड़ी रुकवाकर बैलों को कब्जे में लिया । उसके बाद आज तक मुंबई में मालगाड़ी द्वारा पशु लाना बंद है ।
  • राजस्थान में बकरी ईद के त्यौहार के दौरान पशु मेले में लाए गए और वहाँ से कतलखाने को भेजे जाने वाले 1014 बछड़ों को बचा लिया गया और सवाईमाधोपुर में पशुओं की हेराफेरी करने वाली ट्रेन पर छापा मारकर लगभग 800 बछड़ों को बचाया गया तथा राजस्थान के फलौदी, सुमेरपुर, नागौर में बछड़ों को ले जा रही तीन ट्रक पकड़कर कुल 215 बछड़ों को बचाया गया ।
  • श्री केसरीचंद मेहता की सजगता और मार्गदर्शन से हजारों पशुओं को कतल होने से बचाया जा सका । बकरी ईद पर गैरकानूनी कतल के लिए राजस्थान से नागपुर पैदल ले जाए जा रहे पशुओं को जब्त कर 1200 पशुओं को बचाकर गोवंश रक्षण समिति की बाराशिवनी स्थित पांजरापोल को सौंपा गया ।
  • विनियोग परिवार, श्री वर्धमान परिवार और अखिल भारत कृषि गोसेवा संघ के सरफरोश कार्यकर्ता जीवन को जोखिम में डालकर गोवंश और अन्य जीवों को कतलखाने जाने से बचाते हैं, यह बात नई नहीं है । एक-दो जीव से लेकर 200 - 500 जीवों को बचाया जाना नई बात नहीं है । हाल में औरंगाबाद में एक ही साथ में 923 बछड़ों को सितम्बर, 1998 में और उससे पूर्व 999 बछड़ों को खामगांव में बचाया गया ।
  • दिसम्बर, 99 में राजस्थान के जोधपुर रेलवे स्टेशन से 3 पूरी ट्रेन (40 डिब्बों की एक ट्रेन) भरकर लगभग 5000 बछड़ों को राज्य के बाहर खेती के नाम पर ले जाने से रोका गया था । राज्य सरकार ने मौजूदा कानून बदलने का प्रयास किया है जिसका सुप्रीम कोर्ट में विरोध किया गया है । यह केस होने के बाद से राजस्थान से पशुओं का ट्रेन मार्ग से होने वाला निर्यात बंद हो गया है और इस तरह परंपरा से लाखों की संख्या में गोवंश की रक्षा हुई है ।
  • उपरोक्त केस की कोर्ट की कार्रवाई अभी चल ही रही थी तभी 20-12-99 को फालोदी गांव से और 1400 बछड़ों से भरी गाड़ी पकड़ी गई ।
  • 1998 में राजस्थान से जानेवाली ट्रेन को आणंद में रोका गया, उस ट्रेन से 1700 छोटे बछड़ों को छुड़ाया गया और इन पशुओं को डीसा पांजरापोल में रखा गया ।
  • मई, 2001 में कतल के लिए ले जा रहे 1200 बछड़ों से भरी ट्रेन खरगी रोड़ (छत्तीसगढ़) से चली और जब सागर स्टेशन पर पहुँची तब इस ट्रेन के पशुओं को कब्जे में लेकर दयोदय पांजरापोल, सागर को सौंपा गया । कतल के लिए जा रहे लगभग 1200 बछड़े बचे ।
  • 2-5-2001 को मध्य प्रदेश के बीना जंकशन स्टेशन से 872 भैंस के पाड़े और 300 गाय के बछड़ों को भरकर एक पूरी ट्रेन खरगी रोड़ (छत्तीसगढ़) जा रही थी । उसे जीवदया प्रेमियों ने रोका और श्री केसरीचंद मेहता के सहयोग से म.प्र. के पशु रक्षा कानून के तहत केस दायर किया और 1200 बछड़ों को बचा लिया गया ।
  • 10-2-2002 को गोरक्षक श्री चंद्रकांत ओझा ने गोवंश की कतल के लिए होनेवाली हेरफेर का समाचार श्री केसरीचंद मेहता को नवसारी के तपोवन में पहुँचाया । श्री केसरीचंद मेहता ने तुरंत ही नागपुर के एस.पी. को फोन पर यह समाचार दिया, 1200 पशुओं को श्री विनोद संचेती संचालित गोवंश रक्षा समिति की बाराशिवनी (जिला बालाघाट) स्थित पांजरापोल में अभय दिया गया ।
  • 9-7-2002 से 31-1-2003 के बीच 544 पशुओं को कतलखाने जाने से बचाया गया । बकरी ईद के दिनों के दौरान श्री केसरीचंद मेहता के नेतृत्व में कार्यकर्ताओं ने मालेगांव में कुल 21 ट्रकों में 544 पशुओं को कतलखाना जाने से बचाया था ।
  • श्री गोशाला पांजरापोल संस्था, मालेगांव द्वारा वर्ष 2003-2004 के दौरान कसाइयों के पास से कुल 603 (गोवंश) पशुओं को जप्त किया गया ।
  • 3 अक्टूबर, 2004 को रात के 2 बजे छापा मार कर 1600 गायों को बालघाट गांव के पास से ले जा रहे आदिवासियों के पास से जप्त किया गया ।
  • 25 सितम्बर, 2005 को 5000 पशुओं को मध्य प्रदेश - कटनी गांव के आसपास के जंगल क्षेत्र से बनजारों के पास से जप्त किया गया ।
  • तमिलनाडु में पशुओं को कतलखाने से बचाया गया । विनियोग परिवार और अखिल भारत कृषि गोसेवा संघ के कार्यकर्ताओं ने श्री केसरीचंद मेहता के नेतृत्व में तमिलनाडु से केरल जा रही 4 ट्रकों को पकड़कर 77 बड़े पशुओं को मौत के मुँह से बचाया ।
  • 15 दिसम्बर, 2005 को खरगोन शहर से 1660 बछड़ों को बचाया गया ।
  • 3-4-2005 को राजस्थान से आ रहे ट्रक नं. RJ 19 KJ - 3027 में 52 पशुओं को गले से लटका कर बंधी हालत में बकरी ईद के दिन गैरकानूनी कतल करने के लिए मालेगांव ले जाया जा रहा था । उस समय हमारी सहयोगी संस्था अखिल भारत कृषि गोसेवा संघ के अध्यक्ष श्री केसरीचंद मेहता और उनके सह-कार्यकर्ताओं ने मिलकर इस ट्रक को पकड़कर पशुओं को बचा लिया गया और उसका केस हाईकोर्ट में भी चला । उसके फैसले के रुप में पहले बताए गए अनुसार हाईकोर्ट ने पशुरक्षा के लिए हाईपावर कमिटि गठित करने का आदेश दिया । उसके कुछ दिन बाद दूसरे एक ट्रक में 28 गोवंशीय पशुओं को पकड़ा गया और 30-3-05 को टाटा सुमो वाहन में 6 पशु ले जाते हुए पकड़े गए ।
  • उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड में पड़े लगातार 4-5 वर्ष के भारी अकाल के कारण मालिकों द्वारा त्याग दिए गए लगभग 7700 पशुओं को कसाई कतलखाना ले जा रहे थे । जिसकी जानकारी स्थानीय जीवदया प्रेमी श्री हरिशंकर अवस्थी को होने पर श्री केसरीचंद मेहता के कानूनी मार्गदर्शन के तहत पुलिस को साथ लेकर कसाइयों से पशुओं को कब्जे में लिया गया । पशुओं के लिए भूसा और पानी की व्यवस्था की गई और मध्य प्रदेश की विभिन्न गौशालों में पशुओं को भेजा गया। चार महीने चले इस कार्य में लगभग 24000 पशुओं के लिए मध्यप्रदेश में घासचारा केन्द्र चलाकर लगभग 47,21,000 रुपये का खर्च किया गया ।
  • पशुरक्षा में सहायक हो, ऐसा साहित्य-पुस्तकें, निबंध, पोस्टर, विज्ञापन, परिपत्र आदि प्रकाशित कराया जाता है, जिसकी काफी अच्छी प्रतिक्रिया मिली है ।
  • पिछले 19 वर्षों से विनियोग परिवार तथा अखिल भारत कृषि गोसेवा संघ अनेक पांजरापोलों का दौरा कर सुंदर संचालन करने वाली योग्य पांजरापोल की स्वयं जांच कर आर्थिक मदद कर रहा है । वर्ष 1993-94 से 2000-01 तक में 1,58,90,463 रुपये आर्थिक सहायता के रुप में दिए गए थे। उसके बाद दी गई  वार्षिक सहायता इस प्रकार है :
    1) वर्ष 2001-02 25,84,551 रुपए
    2) वर्ष 2002-03 14,09,000 रुपए
    3) वर्ष 2003-04 19,74,500 रुपए
    4) वर्ष 2004-05 27,70,000 रुपए
    5) वर्ष 2005-06 19,79,000 रुपए
    6) वर्ष 2006-07 31,23,000 रुपए
    7) वर्ष 2007-08 27,56,711 रुपए
    8) वर्ष 2008-09 26,11,052 रुपए
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    कुल 1,92,07,814 रुपए
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    इस तरह अभी तक कुल 3,50,98,277 रुपए का आर्थिक सहयोग दिया गया है ।
  • देश के विभिन्न स्थानों में होने वाले सेमिनारों / संमेलनों आदि में विनियोग परिवार के प्रतिनिधि उपस्थित रहे हैं । योजना आयोग आदि सरकारी विभागों में ज्ञापन दिया है, अनेक राज्यों के पशुपालन /कानूनी मंत्रालयों के साथ उचित कानून / संशोधन आदि करने के लिए सफल मंत्रणाएँ की है और संतोषजनक परिणाम प्राप्त किये हैं ।
  • चारागाह विकास कार्यों की रिपोर्ट : सुरेन्द्रनगर जिले के सायला गांव में श्री सायला महाजन पांजरापोल, सायला जैन संघ तथा विनियोग परिवार द्वारा सायला की 180 एकड़ जमीन पर उग आए विदेशी बबूल के वन को मानव श्रम की मदद से (मशीन से नहीं) हटाकर इस बंजर जमीन को नवपल्लवित किया गया।
  • इसी तरह से वंथली, रापर, मनफरा पांजरापोलों में मानव श्रम की मदद से बबूल को हटाने का कार्य किया ।
  • सूखा राहत कार्य की रिपोर्ट : विक्रम संवत 2057 के भूकंप बाद के भयंकर सूखे ने मानवों की हालत भी खराब कर दी थी तब अबोल पशुओं की चिंता तो कौन करे? ऐसे समय में सीमित साधनों के साथ, प्रजा के कष्ट और पशुधन की असीम पीड़ा की निशब्द चीखों का आर्तनाद सुनकर विनियोग परिवार द्वारा (श्री वढ़वाण महाजन के कार्यकर्ताओं के साथ) झालावाड़ क्षेत्र में अकाल की स्थिति का सामना करने के लिए अलग-अलग गांवों में सरकार की मदद लिये बगैर कुल 50 घासचारा केन्दरों का विशाल नेटवर्प स्थापित किया । इन घासचारा केन्दरों द्वारा लगभग 40,000 से 50,000 पशुओं की देखभाल की जा सकी । इस व्यवस्था में काफी सोच-विचार कर व्यवस्था करने से पिछले वर्ष की तुलना में खर्च काफी कम आया । प्रति पशु 4 रुपये के खर्च में पशुपालक को 9 रुपए कीमत का घास दिया जा सका । भूकंप के बाद गांव की जनता की प्रसन्नता में ये घासचारा केन्द्र सहायक बने थे ।
  • कच्छ के सभी सूखा क्षेत्र में पशु रक्षा के लिए विशाल संस्था में कार्यकर्ताओं की मदद से नेटवर्प स्थापित किया गया। मध्यप्रदेश के बीना जंक्शन से ट्रेन द्वारा कच्छ और झालावाड़ क्षेत्र की 30 से अधिक पांजरापोलों तथा अन्य क्षेत्र में कुल लगभग 965 टन चने के छिलके का वितरण किया गया ।
  • उपरोक्त कार्यों में निम्नानुसार वार्षिक खर्च किया गया
    वर्ष 2000-01 1,09,56,593 रुपए
    वर्ष 2002-03 17,76,383 रुपए
    वर्ष 2003-04 1,01,26,338 रुपए
    वर्ष 2008-09 46,59,118 रुपए
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    कुल 2,75,18,432 रुपए
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  • वर्ष 2009 के कमजोर मानसून के बाद राजस्थान के अधिकांश क्षेत्र में अकाल की परिस्थिति चालू है । वहाँ जोधपुर, पाली, सोजत जिलों में जनवरी, 2010 तक लगभग 40 लाख रुपए का घासचारा पहुँचाया गया ।
  • यह कार्य अभी चालू है और अन्य लगभग 40 से 50 लाख रुपये का घासचारा भेजने की व्यवस्था करने की भावना है ।
  • घास की गंजी बनाने का कार्य : वर्षा अच्छी होने पर और घासचारे का भाव नीचा होने पर घासचारे की खरीदी कर उसे अलग-अलग गांवों में सुरक्षित स्थान पर घास की गंजी के रुप में रखा जाता है और घास की जरुरत होने पर उन्हें खोलकर घासचारे का वितरण किया जाता है । यह सब कार्य श्री अतुल बापु (सुरेन्द्रनगर) के नेतृत्व में किया जाता है ।
  • पशु घासाचारा और निभाव खर्च : बोरसद के पास लगभग 400 वीघा जमीन किराये पर लेकर उसमें 200 वीघा में ज्वार की बुआई कर स्थल पर लागत 12 रुपए मन (20 किलो) के भाव पर हरी ज्वार का वितरण करने की योजना शुरु की गई । बोरसद और आसपास के अन्य क्षेत्र में किसानों को प्रोत्साहन और घास खरीदी और बिक्री की गारंटी देकर किसानों की तीन हजार एकड़ जमीन पर अलग अलग प्रकार की हरी घास की बुआई हुई है ।
  • विक्रम संवत 2058/59 में भी गुजरात के कुछ जिले लगातार चौथे वर्ष सूखे की चपेट में फंसे थे । सीमित साधनों और मानव बल के कारण समस्त गुजरात के पशुओं की मदद तो संभव नहीं थी । अत जिस क्षेत्र में मानव बल की व्यवस्था हो सकी, अर्थात् जहां श्री अतुलभाई (बापु) के नेतृत्व में सैंकड़ों युवक रात-दिन काम करने के लिए तैयार थे, ऐसे झालावाड़ क्षेत्र में गहन सर्वे के बाद 99 स्थानों पर घास-चारा केन्द्राsं की व्यवस्था की गई ।
  • राजस्थान में भयंकर सूखे की परिस्थिति में दहाणु, वापी, अकोला, भुसावल, बीना आदि स्थानों से कुल 8 ट्रेन भरकर घास, चने का छिलका, ज्वार का छिलका और नवसारी से गन्ने के ऊपरी हिस्से के 68 ट्रक पाली और सोजत सिटी में भेजे गए । राजस्थान सरकार की ओर से पाली जिले के कलेक्टर द्वारा घास-चारे की कीमत अदा दी गई, परन्तु व्यवस्था और व्यवस्थापन खर्च विनियोग परिवार द्वारा वहन किया गया ।
  • इस तरह का कार्य सतत चालू है जिसमें : वर्ष 1993-94 से 2000-01 तक 12,54,079 रुपए घासचारा की मदद रुप में दिए गए । उसके बाद दी गई वार्षिक सहायता इस प्रकार है :
    वर्ष 2001-02 2,89,238 रुपए
    वर्ष 2002-03 4,06,605 रुपए
    वर्ष 2003-04 18,59,972 रुपए
    वर्ष 2004-05 11,72,167 रुपए
    वर्ष 2005-06 27,46,690 रुपए
    वर्ष 2006-07 3,56,451 रुपए
    वर्ष 2007-08 14,06,907 रुपए
    वर्ष 2008-09 6,46,286 रुपए
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    कुल रकम 88,84,317 रुपए
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    इस प्रकार अभी तक कुल 1,01,38,396 रुपए का घासचारा वितरित किया गया है ।
  • भूकंप : जनवरी 2001 के भूकंप से बेघर हुए लोगों के लिए विनियोग परिवार और (मिड-डे) मुंबई द्वारा बनाए गए 674 मकान 26-01-2001 को आए भूकंप के बाद भूकंप राहत फंड में कुल 1,67,56,830 रुपए का फंड आया और इस रकम पर ब्याज मिलकर 1,72,12,258 रुपए का खर्च तीन वर्ष की समयावधि में विनियोग परिवार द्वारा किया गया । इस रकम द्वारा उस क्षेत्र में रहने वाले पारंपरिक घर निर्मित करने के जानकार ओड़ जाति के लोगों तथा स्थानीय मजदूरों और कारीगरों का उपयोग कर 300 वर्ग फीट के एक, ऐसे 674 मकान निर्मित किए गए । खर्च की गई रकम का एक-एक रुपया उसी क्षेत्र में रहा। साथ ही ओड़ जाति और पुंभारों का व्यवसाय सजीवन हुआ और पर्यावरण तथा टिकाउपन की दृष्टि से उत्तम मकान बनाए जा सके । इस कार्य के लिए निम्नानुसार वर्षवार खर्च किया गया ।
    वर्ष 2000-01 21,00,917 रुपए
    वर्ष 2001-02 1,22,67,735 रुपए
    वर्ष 2002-03 28,43,605 रुपए
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    कुल रकम 1,72,12,258 रुपए
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  • बाढ़ राहत कार्य : सन् 2005 तथा 2006 में मुंबई तथा महाराष्ट्र और गुजरात में बाढ़ के कारण जो नुकसान हुआ, उस समय विनियोग परिवार के कार्यकर्ताओं द्वारा राहत कैम्प तथा नए मिट्टी के मकान निर्मित करने जैसे अनेक कार्यों के लिए 35.40 लाख रुपए की रकम निम्नानुसार वर्ष बार प्रयुक्त हुई :
    वर्ष 2005-06 9,25,063 रुपए
    वर्ष 2006-07 15,87,607 रुपए
    वर्ष 2007-08 8,59,482 रुपए
    वर्ष 2008-09 1, 68,501 रुपए
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    कुल रकम 35,40,653 रुपए
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  • मानव राहत के कार्य :
    1. झालावाड प्रदेश के अगरियों (नमक बनानेवाले) और देगाम के देवीपूजक जाति के परिवारों को मिट्टी के घर निर्मित करके दिए गए । उन सभी परिवारों को अनाज तथा छाछ वितरण का कार्य किया गया । साथ ही हिंडोणी और सूपडे भी दिये गये ।
    2. हमारे यहां परिवार के साथ रहने के संस्कार कायम हैं । परिवार के साथ रहते, ग्रामीण प्रजा के साथ सत्संग करते, भजन करते अंध परिवार अधिक प्रसन्नता अनुभव करें, इसके लिए 8-10-2006 को विनियोग परिवार और वितराग सेवा केन्द्र द्वारा उन्हे नकद सहायता दी गई ।
    3. वर्ष 2006 में चिकनगुनिया का भयंकर रोग फैला था। उस समय आयुर्वेदिक पद्धति से 1125 रोगियों का दवा सहित निशुल्क व सफल उपचार किया गया ।
    4. झालावाड़ के अगर (नमक बनानेवाले) क्षेत्र की विधवा बहनों को 2-7-2006 को बाजरी तथा अनाज का वितरण किया गया ।
    इस तरह मानवराहत / अनुकंपा का कार्य लगातार चालू है, जिसके वार्षिक खर्च का विवरण इस प्रकार है ;
    वर्ष 2002-03 4,83,347 रुपए
    वर्ष 2003-04 35,002 रुपए
    वर्ष 2004-05 1,32,290 रुपए
    वर्ष 2005-06 9,25,063 रुपए
    वर्ष 2006-07 50,000 रुपए
    वर्ष 2007-08 5,05,328 रुपए
    वर्ष 2008-09 4,65,257 रुपए
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    कुल रकम 25,96,287 रुपए
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  • कच्छ में अबड़ासा तहसील में गो-संवर्धन और समस्त सियासत गांव में पारम्परिक अर्थव्यवस्था का पुनरुद्धार :
  • विनियोग परिवार के कार्यकर्ता श्री देवचंदभाई गडा द्वारा कच्छ में अबड़ासा तहसील के सियासत गांव में अठारह वर्ण के काम-धंधे-व्यवसाय पुनर्जीवित करने का कार्य शुरु किया गया है । प्रथम चरण में 61 गायें (कीमत लगभग 1.80 लाख रुपए) गांव के विभिन्न परिवारों को दी गई । किसानों को लगभग 65,000 रुपए के बीज (ज्वार-बाजरी) दिए गए । अब बैलगाड़ी बनाने का काम चालू है जिसमें लगभग एक लाख रुपए का खर्च होगा । आगे के कार्यक्रम में अठारह वर्ण के व्यवसाय फिर पल्लवित हों, उसके प्रयत्न करने की धारणा है ।

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